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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर

   ईश्वर की छाया है जिसमें वह  पावन दर्पण नारी । केवल मादा देह नहीं है, त्याग समर्पण है नारी ।।   चंचल नदियों की लहरों सी मोहक हिरणी सी किरणों सी संस्कृति के रथ की बन वाहक सबकी चाहत है सपनों सी   कुसुम लता सी कोमल अंगी, बढ़कर प्यार लुटाती है। तरु शाखों पर हरित पर्ण सा, इक आलिंगन है नारी।।   माता बनकर आयी जग में ममता की कहलायी मूरत आयी दुष्ट संहारक बन कर वह   नारी   दुर्गा   की सूरत   पत्नी बनकर जग   इक रचती, बेटी   है   यह   फूलों सी । निर्मल कोमल सा भी कुदरत का इक चुम्बन है नारी।।   नित्य निरंतर   बढ़ती आगे वह जग से लड़ती जाती है नये-नये   उद्देश्यों   को   वह अपने     बल   पर   पाती   है   पुरुषों के   काँधे   से काँधा   जोड़ रही   है वह नारी। नवयुग की हर एक भोर का अब आकर्षण है नारी।। # ~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’