महँगाई ने दफ्तर खोला,
होती रोज़ समीक्षा ।
*
मुद्दा भी है या बस होती,
केवल कोरी चर्चा ।
अब भी जटिल नहीं क्या लगता,
ये दामों का पर्चा ।
*
कितने वेतन फ़ेल हुए हैं,
किसकी बची परीक्षा ।
*
कौन वर्ग है हुआ प्रभावित,
किसको हुआ मुनाफ़ा,
किसकी जेबें खाली लगतीं,
किसका भरा लिफ़ाफ़ा,
*
कोई एक न बचने पाए,
ऐसी करो संवीक्षा ।
*
बोझ उठाकर भी खुश हैं जो,
उन पर घेरा डालो,
हर सीढ़ी पर खंभ गड़ा हो,
ऐसे डेरा डालो ।
*
सबकी चीख सुनाई देगी,
कर लो तनिक प्रतीक्षा ।
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~ अशोक रक्ताले 'फणीन्द्र'
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