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नित होता पाखण्ड

 


 

खींच-खींच कर, पहिया पीछे,

करता कोई जाम ।

थका-थका कुछ, रुका-रुका कुछ,

लगने लगा अवाम ।

*

खोद-खोद खाई भरने का,

नित होता पाखण्ड ।

थाम पताका सीधे-सीधे,

दिखलाते हैं दण्ड ।

*

नाम धर्म के, झाड़ चने के,

चढ़ते लोग तमाम ।

*

आती-जाती ऋतुएँ लेकिन,

आती नहीं बहार ।

उम्र कँटीली भसक रही नित,

मिलते नहीं अनार ।

*

कुम्भ सभी मज़बूर बिक रहे,

औने-पौने दाम ।

*

रंग बदलता गिरगिट से भी,

ज्यादा अब बाज़ार ।

निम्न पंक्ति के मेंढक सारे,

बैठे हैं थक-हार ।

*

गर्म हवाएं छीन ले गईं,

हाथों से सब काम ।

#

~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

 

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