सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जाने कौन दिशा से आए


 


कभी खाट पर सोते टूटी,

कभी जमीं पर सारे

जाने कौन दिशा से आए,

टूट-टूट कर तारे ।

*

कोई स्वप्न सलोने जैसा,

नींद उड़ा दे सारी,

कोई नया-नया भरता है,

जोर-जोर किलकारी ।

*

किसने उर पर पर्वत खींचा,

फाँक लिए अंगारे ।

*

चाल-ढाल से, डील-डौल से,

क्या कोई पहचाने,

आसमान रोये सिसके पर,

इन्हें न अपना माने ।

*

आँख मूंदकर भी देखो तो,

लगते हैं सब प्यारे ।

*

सूने मंदिर का उजियारा,

कोई बना हुआ है,

खुले द्वार से पीठ सटाए,

कोई तना हुआ है ।

 

इनकी पाती लेकर निकले,

दौड़ रहे हरकारे ।

#

~ अशोक  रक्ताले 'फणीन्द्र'


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर

   ईश्वर की छाया है जिसमें वह  पावन दर्पण नारी । केवल मादा देह नहीं है, त्याग समर्पण है नारी ।।   चंचल नदियों की लहरों सी मोहक हिरणी सी किरणों सी संस्कृति के रथ की बन वाहक सबकी चाहत है सपनों सी   कुसुम लता सी कोमल अंगी, बढ़कर प्यार लुटाती है। तरु शाखों पर हरित पर्ण सा, इक आलिंगन है नारी।।   माता बनकर आयी जग में ममता की कहलायी मूरत आयी दुष्ट संहारक बन कर वह   नारी   दुर्गा   की सूरत   पत्नी बनकर जग   इक रचती, बेटी   है   यह   फूलों सी । निर्मल कोमल सा भी कुदरत का इक चुम्बन है नारी।।   नित्य निरंतर   बढ़ती आगे वह जग से लड़ती जाती है नये-नये   उद्देश्यों   को   वह अपने     बल   पर   पाती   है   पुरुषों के   काँधे   से काँधा   जोड़ रही   है वह नारी। नवयुग की हर एक भोर का अब आकर्षण है नारी।। # ~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

नित होता पाखण्ड

    खींच-खींच कर, पहिया पीछे, करता कोई जाम । थका-थका कुछ, रुका-रुका कुछ, लगने लगा अवाम । * खोद-खोद खाई भरने का, नित होता पाखण्ड । थाम पताका सीधे-सीधे, दिखलाते हैं दण्ड । * नाम धर्म के, झाड़ चने के, चढ़ते लोग तमाम । * आती-जाती ऋतुएँ लेकिन, आती नहीं बहार । उम्र कँटीली भसक रही नित, मिलते नहीं अनार । * कुम्भ सभी मज़बूर बिक रहे, औने-पौने दाम । * रंग बदलता गिरगिट से भी, ज्यादा अब बाज़ार । निम्न पंक्ति के मेंढक सारे, बैठे हैं थक-हार । * गर्म हवाएं छीन ले गईं, हाथों से सब काम । # ~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’