नीला पीला लाल गुलाबी, रंग लिए आयी टोली । फिर फागुन की धूम मची है, लो फिर आयी है होली ।। बैर द्वेष मन की कटुता पर, रंग डालकर प्यार भरे, नफरत डाह जलन के सारे, कूप सुखाकर खार भरे, स्नेह प्रीति के रंग उडाती, नभ पर छायी है होली । फिर फागुन की धूम मची है................. नव कलिकाओं ने भी खिलकर, रंग बाग़ में घोल दिए, अलि गुन्जन पर थिरक उठी हैं, द्वार हृदय के खोल दिए, बिखराया मकरंद हवा ने, सौरभ लायी है होली । फिर फागुन की धूम मची है............... ...
खींच-खींच कर, पहिया पीछे, करता कोई जाम । थका-थका कुछ, रुका-रुका कुछ, लगने लगा अवाम । * खोद-खोद खाई भरने का, नित होता पाखण्ड । थाम पताका सीधे-सीधे, दिखलाते हैं दण्ड । * नाम धर्म के, झाड़ चने के, चढ़ते लोग तमाम । * आती-जाती ऋतुएँ लेकिन, आती नहीं बहार । उम्र कँटीली भसक रही नित, मिलते नहीं अनार । * कुम्भ सभी मज़बूर बिक रहे, औने-पौने दाम । * रंग बदलता गिरगिट से भी, ज्यादा अब बाज़ार । निम्न पंक्ति के मेंढक सारे, बैठे हैं थक-हार । * गर्म हवाएं छीन ले गईं, हाथों से सब काम । # ~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’